(બ્રાહ્મણોત્પત્તિ માર્તંડ પાનું 576-577 પ્રમાણે)
एकदा रामचंद्रा पुत्रो लवकुशौ पुरा ।
यात्रार्थ मागतौ सिध्धक्षेत्रं गुर्जर संज्ञके ।। 1 ।।
तत्र तीर्थविधिं कृत्वा किचिंत् दूर स्थितां तत :
उमा देवीं नमस्कृत द्ष्टवा तस्या: प्रभावक्म ।। 2 ।।
तत्र त्यान् कर्षकान् शूद्रान् दीनान् पक्ष विहीनकान् ।
उमाया:  सेवानार्थ वै स्थापयामा सतुर्मुदा ।। 3 ।।
लवेन स्थापिता: शुद्रास्ते लवा: परिकीर्तिता:
कुशेन स्थापिता ये वै ते कुशा: कयुकामिधा: ।। 4 ।।
द्दादशे द्दादशे वर्षे हुमाया: वरदानत:
कटुकानां कन्यकानां विवाहो भवति ध्रुवम् ।। 5 ।।
तथा बाह्य वरस्यैव रीतिरेषां विचित्रका ।
पुन विंवाहो भवति द्रयो मध्ये विशेषत: ।। 6 ।।
एतद् शिषअटान् मुखान् श्रुत्वा ।
हरिकृष्णेन निर्मितिम् ।। 7 ।।
इति क्षी ब्राह्मणोत्पति मार्तडाध्ये लवकुश स्थापित शुद्रोत्प्ति वर्णनम् नाम प्रकरणम् ।। 48 ।। अध्याय-श्लोक- 85-47 ।।
બ્રાહ્મણોત્પત્તિ માર્તંડના સાત સંસ્કૃત બનાવટી શ્લોકોનું બ્રાહ્મણોત્પત્તિ માર્તડમાં છાપેલું હિંદી ભાષાંતર.
अब गुजरात देशमें जो लेवे पाटीदार और कणवे ज्ञाति है उनकी उत्प्ति कहते है
एक गिन रामचन्द्रके पुत्र लव और कुश यह दोनों यात्राके वास्ते गुजरात देशमें सिध्धरेश्वर श्रेत्रमें आये ।। 1 ।।
वहाँ तिर्थविधि सब करके सिध्धपुर के नजदिक दक्षिण भागमें प्राय: पाँच कोशके उपर उंझा करके गाँव हे वहाँ उमिया देवी बिराजती हें ।। उनका नमस्कार पूजादिक करके ओर देवीका प्रताप देख के ।। 2 ।।
यहाँ के रहनेवाले खेती करनेवाले शुद्र गरीब अवस्थामें रहते थे ।उनको देखके उमियादेवीकी सेवा करनेके वास्ते परम हर्षसे शुद्रो का स्थापन किया ।। 3 ।।
लवने जो शुद्र स्थापन किये वे लेवे पाटीदार भये । कोई गाँवमे दालका व्यापार करने इस वास्ते दालिये भी कहते है । र कुशने जो शुद्र  स्थापन किये वे कडवे कणबी भये ।
एसे यह दोनों समूह उमा क्षेत्रमें रहते थे । एक दिन कडवेके लोग देवीके गाँव चराने के लिये थे । इतनें क्षेत्रमें विवाहका उत्तम समय आया । देवीने जो वहां हांजिर थे लव समूह के लोग उनकी शादी विवाह कर दिये । बाद गायें चरायके कुश समूह गायके देखो तो लेवे ज्ञातिके विवाह भये और हम रह गये तब देवीकी प्रार्थना करने लगें । उस समय देवीने प्रसन्न होकर कहा कि तुम्हारी छोकरीयोंका विवाह बारह बरसमें होवेगा । सो अधापि कडवे शुद्र ज्ञातिमें
ચરોતર

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